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सुबह के अज़कार (अज़कार-ए-सबाह)

सुबह के अज़कार फ़ज्र के बाद से सूरज निकलने तक पढ़े जाते हैं। यहाँ हिस्नुल मुस्लिम से सुबह के पूरे अज़कार हैं, अरबी, उच्चारण, मतलब, हर एक कितनी बार पढ़ना है, उसकी फ़ज़ीलत और स्रोत के साथ।

  • 1. आयतुल कुर्सी पढ़ना

  • 1 बार पढ़ें

ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْحَىُّ ٱلْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُۥ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ ۚ لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ مَن ذَا ٱلَّذِى يَشْفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذْنِهِۦ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَىْءٍ مِّنْ عِلْمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ ۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْعَظِيمُ

मतलब

अल्लाह - उसके सिवा कोई माबूद नहीं, वह हमेशा ज़िंदा रहने वाला,1 सबको संभालने वाला है।2 उसे न ऊँघ आती है न नींद। जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब उसी का है। कौन है जो उसकी इजाज़त के बिना उसके पास सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो कुछ [इस वक़्त] उनके सामने है और जो कुछ उनके बाद होगा,3 और वे उसके इल्म में से किसी चीज़ का घेराव नहीं कर सकते सिवाय उसके जो वह चाहे। उसकी कुर्सी4 आसमानों और ज़मीन पर फैली हुई है, और उनकी हिफ़ाज़त उसे थकाती नहीं। और वह सबसे बुलंद,5 सबसे बड़ा है।6

फ़ज़ीलत

जो इसे शाम को पढ़े, अल्लाह सुबह तक तरह-तरह की परेशानियों से उसकी हिफ़ाज़त करेगा। और जो इसे सुबह पढ़े, शाम तक उसकी हिफ़ाज़त की जाएगी। [हाकिम (1:562) ने रिवायत किया। शैख़ अल्बानी ने सहीह अत-तरग़ीब वत-तरहीब नं. 655 में इसे सहीह कहा है]

स्रोत: क़ुरआन अल-बक़रा: 255

  • 2. सूरह अल-इख़लास, अल-फ़लक़ और अन-नास पढ़ना

  • 3 बार पढ़ें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ ١ ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ ٢ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ٣ وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدٌ ٤ بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلْفَلَقِ ١ مِن شَرِّ مَا خَلَقَ ٢ وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ ٣ وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّـٰثَـٰتِ فِى ٱلْعُقَدِ ٤ وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ ٥ بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ ١ مَلِكِ ٱلنَّاسِ ٢ إِلَـٰهِ ٱلنَّاسِ ٣ مِن شَرِّ ٱلْوَسْوَاسِ ٱلْخَنَّاسِ ٤ ٱلَّذِى يُوَسْوِسُ فِى صُدُورِ ٱلنَّاسِ ٥ مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ ٦

मतलब

कहो, "वह अल्लाह एक है,1 अल्लाह बेनियाज़ है (सब उसके मोहताज हैं)।1 न उसकी कोई औलाद है और न वह किसी की औलाद है, और न कोई उसके बराबर है।" कहो, "मैं सुबह के रब की पनाह माँगता हूँ, हर उस चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की, और अंधेरी रात की बुराई से जब वह छा जाए, और गिरहों में फूँकने वालियों की बुराई से,1 और हसद करने वाले की बुराई से जब वह हसद करे।" कहो, "मैं इंसानों के रब की पनाह माँगता हूँ, इंसानों के बादशाह की, इंसानों के माबूद की, उस वसवसा डालने वाले की बुराई से जो पीछे हट जाता है1 - जो इंसानों के सीनों में [बुरे] वसवसे डालता है - जिन्नों में से भी और इंसानों में से भी"।1

फ़ज़ीलत

जो सुबह और शाम इनमें से हर एक को तीन बार पढ़े, ये उसके लिए हर चीज़ से काफ़ी हो जाएँगी। [अबू दाऊद नं. 5082 और तिर्मिज़ी नं. 3575 ने रिवायत किया। हाफ़िज़ अबू ताहिर ने इसकी सनद को हसन कहा है]

स्रोत: क़ुरआन अल-इख़लास: 1-4@क़ुरआन अल-फ़लक़: 1-5@क़ुरआन अन-नास: 1-6

  • 3. आज के दिन की भलाई माँगना

  • 1 बार पढ़ें

أَصْبَحْنَا وَأَصْبَحَ ٱلْمُلْكُ لِلَّهِ، وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ، لَآ إِلَهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ ٱلْمُلْكُ وَلَهُ ٱلْحَمْدُ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرُ. رَبِّ أَسْأَلُكَ خَيْرَ مَا فِي هَذَا ٱلْيَوْمِ وَخَيْرَ مَا بَعْدَهُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِن شَرِّ مَا فِي هَذَا ٱلْيَوْمِ وَشَرِّ مَا بَعْدَهُ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنَ ٱلْكَسَلِ وَسُوءِ ٱلْكِبَرِ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابٍ فِي ٱلنَّارِ وَعَذَابٍ فِي ٱلْقَبْرِ

मतलब

हमने सुबह की और सारी बादशाही अल्लाह की है; सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। बादशाही उसी की है और सारी तारीफ़ उसी के लिए है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। मेरे रब, मैं तुझसे इस दिन की भलाई और इसके बाद की भलाई माँगता हूँ, और इस दिन की बुराई और इसके बाद की बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ। मेरे रब, मैं सुस्ती और बुढ़ापे की ख़राबियों से तेरी पनाह माँगता हूँ। मेरे रब, मैं आग के अज़ाब और क़ब्र के अज़ाब से तेरी पनाह माँगता हूँ।

फ़ज़ीलत

इस दुआ में अल्लाह से इस दिन और इसके बाद की भलाई माँगी जाती है, और इस दिन और इसके बाद की बुराई से हिफ़ाज़त माँगी जाती है। इसमें अमल की ताक़त होते हुए भी सुस्ती से, बुढ़ापे की कमज़ोरी से, और क़ब्र और जहन्नम के अज़ाब से भी पनाह माँगी जाती है, जो क़यामत के दिन के सबसे सख़्त अज़ाब हैं। [मुस्लिम नं. 2723 ने रिवायत किया। देखें शरह हिस्नुल मुस्लिम, पृ. 161]

  • 4. सुबह होने पर दुआ

  • 1 बार पढ़ें

ٱللَّهُمَّ بِكَ أَصْبَحْنَا، وَبِكَ أَمْسَيْنَا، وَبِكَ نَحْيَا، وَبِكَ نَمُوتُ وَإِلَيْكَ ٱلنُّشُورُ

मतलब

ऐ अल्लाह, तेरी रहमत और मदद से हमने सुबह की, तेरी रहमत और मदद से हमने शाम की, तेरी रहमत और मदद से हम जीते हैं, तेरी मर्ज़ी से हम मरते हैं, और तेरी ही तरफ़ (मरने के बाद) उठकर जाना है।

स्रोत: तिर्मिज़ी नं. 3391 और अबू दाऊद नं. 5068 ने रिवायत किया। हाफ़िज़ अबू ताहिर ने इसकी सनद को सहीह कहा है।

  • 5. सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार पढ़ना

  • 1 बार पढ़ें

ٱللَّهُمَّ أَنتَ رَبِّي لَآ إِلَهَ إِلَّا أَنتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا۠ عَبْدُكَ، وَأَنَا۠ عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا ٱسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِن شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَٱغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ ٱلذُّنُوبَ إِلَّا أَنتَ.

मतलब

ऐ अल्लाह, तू मेरा रब है; तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तूने मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं जितना हो सके तुझसे किए अहद और वादे पर क़ायम हूँ। जो बुराई मैंने की उससे तेरी पनाह माँगता हूँ। मैं अपने ऊपर तेरी नेमत का इक़रार करता हूँ और अपने गुनाह का इक़रार करता हूँ, तो मुझे माफ़ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं करता।

फ़ज़ीलत

जो दिन में पूरे यक़ीन के साथ यह ज़िक्र पढ़े और शाम से पहले मर जाए, वह जन्नत वालों में से होगा। और जो रात में पूरे यक़ीन के साथ इसे पढ़े और सुबह से पहले मर जाए, वह जन्नत वालों में से होगा। [बुख़ारी नं. 6306 ने रिवायत किया]

  • 6. सुबह अल्लाह की तौहीद का इक़रार

  • 4 बार पढ़ें

ٱللَّهُمَّ إِنِّي أَصْبَحْتُ أُشْهِدُكَ وَأُشْهِدُ حَمَلَةَ عَرْشِكَ، وَمَلَائِكَتَكَ وَجَمِيعَ خَلْقِكَ، أَنَّكَ أَنتَ ٱللَّهُ لَآ إِلَهَ إِلَّا أَنتَ وَحْدَكَ لَا شَرِيكَ لَكَ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُكَ وَرَسُولُكَ

मतलब

ऐ अल्लाह, आज सुबह मैं तुझे, तेरे अर्श उठाने वालों को, तेरे फ़रिश्तों को और तेरी सारी मख़लूक़ को गवाह बनाता हूँ कि तू ही अल्लाह है; तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तू अकेला है, तेरा कोई शरीक नहीं, और मुहम्मद तेरे बंदे और रसूल हैं।

फ़ज़ीलत

जो सुबह और शाम यह ज़िक्र चार बार पढ़े, अल्लाह उसे जहन्नम के अज़ाब से आज़ाद कर देगा। [अबू दाऊद नं. 5069 ने रिवायत किया। हाफ़िज़ अबू ताहिर ने इस हदीस को हसन कहा है।]

  • 7. दुनिया और आख़िरत में आफ़ियत माँगना

  • 1 बार पढ़ें

ٱللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ ٱلْعَفْوَ وَٱلْعَافِيَةَ فِي ٱلدُّنْيَا وَأْلـَٔاخِرَةِ، ٱللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ ٱلْعَفْوَ وَٱلْعَافِيَةَ فِي دِينِي وَدُنْيَايَ وَأَهْلِي وَمَالِي ٱللَّهُمَّ ٱسْتُرْ عَوْرَاتِى وَءَامِن رَّوْعَاتِى. ٱللَّهُمَّ ٱحْفَظْنِي مِن بَيْنِ يَدَيَّ، وَمِنْ خَلْفِي، وَعَن يَمِينِي وَعَن شِمَالِي، وَمِن فَوْقِي، وَأَعُوذُ بِعَظَمَتِكَ أَنْ أُغْتَالَ مِن تَحْتِي

मतलब

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे दुनिया और आख़िरत में माफ़ी और आफ़ियत माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे अपने दीन, अपनी दुनिया, अपने घर वालों और अपने माल में माफ़ी और आफ़ियत माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मेरे ऐबों पर पर्दा डाल दे और मेरे डर को अमन में बदल दे। ऐ अल्लाह, मेरे आगे से, मेरे पीछे से, मेरे दाएँ से, मेरे बाएँ से और मेरे ऊपर से मेरी हिफ़ाज़त फ़रमा, और मैं तेरी अज़मत की पनाह माँगता हूँ इस बात से कि मुझे नीचे से अचानक हलाक कर दिया जाए।

फ़ज़ीलत

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सुबह और शाम यह दुआ कभी नहीं छोड़ते थे। इसमें दीन, दुनिया, घर वालों और माल के लिए हर तरफ़ से आने वाले नुक़सान से हिफ़ाज़त और आफ़ियत माँगी जाती है। [अबू दाऊद नं. 5074 और इब्ने माजा नं. 3871 ने रिवायत किया। हाफ़िज़ अबू ताहिर ने इसकी सनद को सहीह कहा है।]

  • 8. सुबह, शाम और सोने के वक़्त की दुआ

  • 1 बार पढ़ें

ٱللَّهُمَّ عَـٰلِمَ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ فَاطِرَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَأْلأَرْضِ، رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أَشْهَدُ أَن لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنتَ أَعُوذُ بِكَ مِن شَرِّ نَفْسِي، وَمِن شَرِّ ٱلشَّيْطَـٰنِ وَشِرْكِهِ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوٓءًا أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ

मतलब

ऐ अल्लाह, छुपे और खुले के जानने वाले, आसमानों और ज़मीन को पैदा करने वाले, हर चीज़ के रब और मालिक। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। मैं तेरी पनाह माँगता हूँ अपने नफ़्स की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके शिर्क की तरफ़ बुलाने से, और इस बात से कि अपने ऊपर कोई बुराई कर बैठूँ या किसी मुसलमान तक उसे पहुँचाऊँ।

फ़ज़ीलत

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह दुआ अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु को सिखाई कि वह इसे सुबह, शाम और सोने से पहले पढ़ें। [तिर्मिज़ी नं. 3392 और अबू दाऊद नं. 5067 ने रिवायत किया। हाफ़िज़ अबू ताहिर ने इसकी सनद को सहीह कहा है। आख़िरी जुमला (وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِيْ سُوْءًا أَوْ أَجُرُّهُ إِلَى مُسْلِمٍ) अहमद 2:196 में इज़ाफ़ा है। शैख़ शुऐब अल-अरनाऊत ने दूसरी सनदों की बुनियाद पर इस हदीस को सहीह कहा है।]

  • 9. अचानक नुक़सान से हिफ़ाज़त की दुआ

  • 3 बार पढ़ें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلَّذِى لَا يَضُرُّ مَعَ ٱسْمِهِ شَىْءٌ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِى ٱلسَّمَآءِ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ

मतलब

अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ ज़मीन या आसमान की कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकती, और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।

फ़ज़ीलत

जो सुबह तीन बार और शाम तीन बार यह ज़िक्र पढ़े, उसे कोई चीज़ अचानक नुक़सान नहीं पहुँचाएगी। [अबू दाऊद नं. 5088, 5089, तिर्मिज़ी नं. 3388 और इब्ने माजा नं. 3869 ने रिवायत किया। हाफ़िज़ अबू ताहिर ने इसकी सनद को हसन कहा है।]

  • 10. रज़ामंदी

  • 3 बार पढ़ें

رَضِيتُ بِٱللَّهِ رَبًّا، وَبِالْإِسْلَامِ دِينًا، وَبِمُحَمَّدٍ صَلَّى ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَبِيًّا

मतलब

मैं अल्लाह को अपना रब मानकर, इस्लाम को अपना दीन मानकर, और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपना नबी मानकर राज़ी हूँ।

फ़ज़ीलत

जो सुबह तीन बार और शाम तीन बार यह ज़िक्र पढ़े, वह अल्लाह की रज़ा का हक़दार हो जाता है। [अबू दाऊद नं. 5072 और तिर्मिज़ी नं. 3389 ने रिवायत किया। हाफ़िज़ अबू ताहिर ने इस हदीस को हसन कहा है]

  • 11. कामों में आसानी की दुआ

  • 1 बार पढ़ें

يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ بِرَحْمَتِكَ أَسْتَغِيثُ، وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّهُ وَلَا تَكِلْنِيٓ إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ أَبَدًا

मतलब

ऐ हमेशा ज़िंदा रहने वाले, ऐ सबको संभालने वाले, तेरी रहमत के वसीले से मैं मदद माँगता हूँ। मेरे सारे काम सँवार दे, और मुझे पलक झपकने के बराबर भी मेरे अपने हवाले न कर।

फ़ज़ीलत

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह ज़िक्र फ़ातिमा को सिखाया कि वह इसे सुबह और शाम पढ़ें। [इब्नुस्सुन्नी ने अमलुल यौमि वल-लैलह नं. 46 में, नसई ने अल-कुबरा (381/570) में, बज़्ज़ार ने अपनी मुसनद (4/25/3107) में, और हाकिम (1:545) ने रिवायत किया। शैख़ अल्बानी ने अस-सिलसिला अस-सहीहा नं. 227 में इसकी सनद को हसन कहा है।]

  • 12. अल्लाह की तौहीद का इक़रार

  • 1 बार पढ़ें

أَصْبَحْنَا عَلَى فِطْرَةِ ٱلْإِسْلَـٰمِ وَعَلَى كَلِمَةِ ٱلْإِخْلَاصِ، وَعَلَى دِينِ نَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ صَلَّى ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، وَعَلَى مِلَّةِ أَبِينَآ إِبْرَٰهِيمَ، حَنِيفًا مُّسْلِمًا وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ

मतलब

सुबह हम इस्लाम की फ़ितरत पर, इख़लास के कलिमे पर, अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दीन पर, और अपने बाप इब्राहीम के तरीक़े पर हैं, जो एक तरफ़ा होकर अल्लाह के फ़रमाँबरदार थे, और वह मुशरिकों में से नहीं थे।

स्रोत: अहमद (3:406) ने रिवायत किया। शैख़ शुऐब अल-अरनाऊत ने कहा कि इसकी सनद बुख़ारी और मुस्लिम की शर्त पर सहीह है। अस-सिलसिला अस-सहीहा नं. 2989 भी देखें।

  • 13. हल्का ज़िक्र, तराज़ू में भारी

  • 100 बार पढ़ें

سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ وَبِحَمْدِهِ

मतलब

अल्लाह पाक है, और उसी की तारीफ़ है।

फ़ज़ीलत

जो सुबह और शाम सौ बार 'सुब्हानल्लाहि व बिहम्दिही' कहे, क़यामत के दिन कोई उससे बेहतर चीज़ लेकर नहीं आएगा सिवाय उसके जिसने इतना ही या इससे ज़्यादा कहा हो। [मुस्लिम नं. 2692 ने रिवायत किया]

  • 14. अल्लाह की तौहीद का इक़रार

  • 10 बार पढ़ें

لَآ إِلَهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ ٱلْمُلْكُ وَلَهُ ٱلْحَمْدُ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرُ

मतलब

अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। बादशाही उसी की है और सारी तारीफ़ उसी के लिए है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।

फ़ज़ीलत

<p><b>एक बार या दस बार पढ़ने की फ़ज़ीलत</b></p> <p>जो सुबह यह ज़िक्र दस बार पढ़े, अल्लाह उसके लिए दस नेकियाँ लिखता है, दस गुनाह मिटाता है, उसे दस ग़ुलाम आज़ाद करने जैसा सवाब देता है, और शाम तक शैतान से उसकी हिफ़ाज़त करता है। और जो इसे शाम को कहे, उसे भी यही फ़ज़ीलत मिलती है। [नसई ने अल-कुबरा 6:10 में रिवायत किया]</p> <br /> <p><b>दिन में सौ बार पढ़ने की फ़ज़ीलत</b></p><p>जो दिन में सौ बार यह ज़िक्र कहे, उसे दस ग़ुलाम आज़ाद करने जैसा सवाब मिलता है। उसके लिए सौ नेकियाँ लिखी जाती हैं, सौ गुनाह मिटाए जाते हैं, और सुबह से शाम तक शैतान से उसकी हिफ़ाज़त की जाती है। कोई उससे बेहतर अमल नहीं करता सिवाय उसके जो इससे ज़्यादा पढ़े। [बुख़ारी नं. 3293 और मुस्लिम नं. 2691 ने रिवायत किया]</p>

  • 15. अल्लाह सुब्हानहू व तआला की तारीफ़

  • 3 बार पढ़ें

سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ وَبِحَمْدِهِ: عَدَدَ خَلْقِهِ، وَرِضَا نَفْسِهِ، وَزِنَةَ عَرْشِهِ وَمِدَادَ كَلِمَاتِهِ

मतलब

अल्लाह पाक है और उसी की तारीफ़ है, उसकी मख़लूक़ की गिनती के बराबर, उसकी रज़ा के बराबर, उसके अर्श के वज़न के बराबर, और उसके कलिमात की स्याही के बराबर।

फ़ज़ीलत

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जुवैरिया से फ़रमाया कि यह ज़िक्र उस ज़िक्र से भारी है जो उन्होंने फ़ज्र के बाद से चाश्त तक किया था। [मुस्लिम नं. 2726 ने रिवायत किया]

  • 16. फ़ायदेमंद इल्म और रोज़ी माँगना

  • 1 बार पढ़ें

ٱللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَّافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلاً مُّتَقَبَّلاً

मतलब

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे फ़ायदेमंद इल्म, अच्छी हलाल रोज़ी और क़बूल होने वाले अमल माँगता हूँ।

फ़ज़ीलत

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे फ़ायदेमंद इल्म, हलाल रोज़ी और ऐसे क़बूल अमल माँगता हूँ जिनका अच्छा बदला मिले। [इब्ने माजा नं. 925 और अहमद 6:305, 322 ने रिवायत किया। हाफ़िज़ अबू ताहिर ने इस हदीस को सहीह कहा है।]

  • 17. इस्तिग़फ़ार

  • दिन में 100 बार पढ़ें

أَسْتَغْفِرُ ٱللَّهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ

मतलब

मैं अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ और उसी की तरफ़ तौबा करता हूँ।

स्रोत: बुख़ारी नं. 6307 और मुस्लिम नं. 2702 ने रिवायत किया

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